Zamaane se bachaai hai

Wrote a gazal after a long while. Hope you like it:

मेरी करवटों में बसी जो तबाही है,
वही तेरी आँखों में आज छाई है।

जो नागँवाराँ है अहल-ए-हुक्म को आज,
वही धुन हमने कई बार गाई है।

इक उम्र से ये आस थी आसमाँ से,
आखिर इस शहर मे भी बाढ़ आई है।

हमने माना की फूलों की सेज नहीं है,
पर ये राह बड़ी फ़ुरसत से बनाई है।

इक ज़माने मे जिसको राख़ कहते थे,
आज वही मेरे कलम की स्याही है।

इस गज़ल मे जो ख़नक है सच की,
बड़ी मेहनत से ज़माने से बचाई है।

31. August 2011 by Nikhilesh Ghushe
Categories: Darshan, Self-composed, Sukhan | Leave a comment

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