Zarquon is not very punctual

Even prophets don’t have a sense of proportion

Majaaz


Majaaz, the Keats of India, died alone, off heavy drinking, in a tavern in Lucknow. But he is probably one of the very few ‘progressive’ urdu poets, for whatever it means or whatever is left of it to mean. Best of his works are primarily romantic, with heavy-duty mushiness, like this one:

हदें जो ख़ींच रखी हैं हरम के पासबानों ने ,
बिना मुजरिम बने पैगाम मै पहु्चा नही सकता।

But I’m going to post here a very different kind of his poem, its called Awaaraa. If you concentrate a bit, you might find a second, and sometimes a third, level of meaning out of the lines. Here it is:

शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फ़िरूँ
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फ़िरूँ
गैर की बस्ती है कब तक दर बदर मारा फ़िरूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करुँ

झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़न्जीर सी
रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर चलती हुई शमशीर सी

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करुँ

ये रुपहली छाओँ, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर जैसे आशिक़ का ख़याल
आह! लेकिन कौन जाने, कौन समझे जी का हाल

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करुँ

फिर वो टूटा इक सितारा फिर वो छूटी फुल्झड़ी
जाने किस की गोद में आये ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी चोट सी दिल पर पड़ी

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रात हँस हँस कर ये कहती है के मैख़ाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लालारुख़्ह के काशाने में चल
ये नहीं मुम्किन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

हर तरफ़ बिखरी हुई रंगीनियाँ रानाईयाँ
हर क़दम पर इशरतें लेती हुई अंगड़ाईयाँ
बढ़ रही है गोद फैलाये हुए रुसवाईयाँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रास्ते में रुक के दम ले लूँ मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये ये क़िस्मत नहीं

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

मुन्तज़िर है एक तूफ़ान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा अहद-ए-वफ़ा मेरे लिये

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

जी में आता है कि अब अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ
उन को पा सकता हूँ मैं ये आसरा भी छोड़ दूँ
हाँ मुनासिब है ये ज़न्जीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफ़्लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

दिल मे एक शोला भड़क उठा है आख़िर क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है आख़िर क्या करूँ
ज़ख़्म सीने का महक उठा है आख़िर क्या करूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकड़ों चन्गेज़-ओ-नादिर हैं नज़र के सामने
सैकड़ों सुल्तान जाबर हैं नज़र के सामने

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ले के इक चन्गेज़ के हाथों से ख़न्जर तोड़ दूँ
ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या न तोड़े मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

बढ़ के इस इन्दर-सभा का साज़-ओ-सामाँ फूँक दूँ
इस का गुल्शन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
तख़्त-ए-सुल्ताँ क्या मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

जी में आता है ये मुर्दा चाँद-तारे नोच लूँ
इस किनारे नोच लूँ और उस किनारे नोच लूँ
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

Filed under: Gazal and Poetry, Jeevan Darshan, Sukhan — nikhilesh.ghushe at 12:14 am on Thursday, September 21, 2006

The best of me :)


Filed under: Images — nikhilesh.ghushe at 11:53 am on Monday, September 11, 2006