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… आज ही होगा।
aaj fir hoga :)
I posted a piece from this poem earlier. That was all I remembered from the poem then. And I didn’t even know the poet then. I posted it here earlier. Fortunately I found some of the old textbooks at home and found the entire poem in there. It’s written by Balakrishna Rao, and here’s the entire poem:
मनाना चाहता है आज ही?
- तो मान ले
त्योहार का दिन
आज ही होगा!
उमंगे यूँ अकारण ही नही उठती,
न अनदेखे इशारों पर
कभी यूँ नाचता है मन;
खुले-से लग रहे हैं द्वार मन्दिर के?
बढ़ा पग,
मूर्ती के शृंगार का दिन
आज ही होगा!
न जाने आज क्यों जी चाहता है -
स्वर मिलाकर
अनसुने स्वर में किसी के
कर उठे जयकार!
न जाने क्यों
बिना पाए हुए ही दान
याचक मन
विकल है
व्यक्त करने के लिए आभार!
कोई तो, कहीं तो
प्रेरणा का स्रोत होगा ही -
उमंगे यूँ अकारण ही नहीं उठती,
नदी में बाढ़ आई है,
कहीं पानी गिरा होगा।
अचानक शिथिल-बंधन हो रहा है आज
मोक्षासन्न बंदी मन -
किसी की हो,
कहीं कोई भगीरथ-साधना पुरी हुई होगी,
किसी भागीरथी के भुमि पर अवतार का दिन
आज ही होगा!
Aaj hi hoga
मनाना चाहता है तो मान ले,
त्योहार का दिन आज ही होगा।
उमंगे यूँ अकारण ही नही उठती,
न अनदेखे इशारों पर कभी यूँ नाचता है मन,
खुले-से लग रहे हैं द्वार मन्दिर के,
बढ़ा पग मूर्ती के शृंगार का दिन आज ही होगा।
मनाना चाहता है तो मान ले,
त्योहार का दिन आज ही होगा।
Added the entire poem here: http://blog.ghushe.com/2006/07/10/aaj-fir-hoga/