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Aao ki khwaab bunein…

Found a gem by Sahir Ludhianvi:

आओ कि ख़्वाब बुनें, कल के वास्ते
वरना ये रात, आज के संगीन दौर की
ड़स लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीन ख़्वाब बुन सके

[ संगीन दौर == difficult time ]
[ ता-उम्र == till the end of life ]

गो हमसे भागती रही ये तेज़-ग़ाम उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र

[ तेज़-ग़ाम == fast ]

ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होटों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब,
मैराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुखन के ख़्वाब,
तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोघ-ए-वतन के ख़्वाब,
ज़िन्दा के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब

[ मैराज-ए-फ़न == proficiency in an art form ]
[ कमाल-ए-सुखन == excellence in expression/poetry ]
[ तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी == good and civilized life ]
[ फ़रोघ-ए-वतन == nation's progress ]
[ ज़िन्दा == prison cell ]
[ कूचा-ए-दार-ओ-रसन == the path leading to gallows]

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल की असास थे
ये ख़्वाब मर गए हैं तो बेरंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-संग है हयात

[ असास == basis ]
[ दस्त-ए-तह-ए-संग == hand pressed under the force of a rock ]

आओ कि ख़्वाब बुनें, कल के वास्ते
वरना ये रात, आज के संगीन दौर की
ड़स लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीन ख़्वाब बुन सके

24. June 2011 by Nikhilesh Ghushe
Categories: Darshan, Sahir, Sukhan | Leave a comment