Kaun Jane

Balkrishna Rao is not a very well known Hindi poet. But one of his poems got stuck to my head when I was a little boy- “Aaj hi hoga“. Over the years, I’ve recited the poem in small gatherings and parties. I’ve sung it to many of my friends many times, and it got stuck in many of their heads too 🙂 After a long time I found another poem of this poet. As brilliant as the earlier one, perhaps better. Here is it:

झुक रही है भूमि बाँयी ओर, फिर भी
कौन जाने,
नियति की आँखें बचाकर,
आज धारा दाहिने बह जाए !
[नियति == destiny]

जाने
किस किरण-शर के वरद आघात से
निर्वर्ण रेखाचित्र यह बीती निशा का
रँग उठे कब, मुखर हो कब
मूक क्या कह जाए !
[किरण-शर == an arrow of light rays] [वरद == blessed] [निर्वर्ण == colorless][रेखाचित्र == sketch] [निशा == night] [मुखर == here it means to become expressive]

‘संभव क्या नहीं है आज ?’
लोहित लेखनी प्राची क्षितिज की
कर रही है प्रेरणा या प्रश्न अंकित ?
[लोहित == red] [लेखनी == pen] [प्राची == east] [क्षितिज == horizon]

कौन जाने
आज ही निःशेष हों सारे
सँजोए स्वप्न
दिन की सिद्धियों में –
या कंही अवशिष्ट फिर भी
एक नूतन स्वप्न की संभावना रह जाए !
[निःशेष == dissolved, complete] [सिद्धियों == achievements] [अवशिष्ट == remainder] [नूतन == new]

Dastoor

Habib Jalib, was a Pakistani revolutionary poet, who spent most of his life fighting against dictatorial regimes and ruling classes there. Because of which, he did spend a lot of his time in prison. This is his best known poem along with the video of his own reading in a public meeting:

दीप जिसका महल्लात ही में जले
चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले
वो जो साये में हर मसलेहत के पले
ऐसे दस्तूर को,
सुबह-ए-बेनूर को,
मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता।
[महल्लात == palaces (plural of महल)]
[मसलेहत == expediency]
[दस्तूर == system, convention]
[बेनूर == dark]

मैं भी खाइफ़ नहीं तख्ता-ए-दार से।
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़ियार से।
क्यों डराते हो ज़िन्दों की दीवार से?
ज़ुल्म की बात को,
जहल की रात को,
मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता।
[खाइफ़ == one having fear (खौफ़)]
[तख्ता-ए-दार == platform for execution]
[मंसूर == martyr]
[अग़ियार == strangers, used here in the send of tell ‘the world’]
[ज़िन्दां == jail]
[जहल == stupidity/ignorance, virtue of being जाहिल]

“फूल शाख़ों पे खिलने लगे”, तुम कहो,
“जाम रिंदो को मिलने लगे”, तुम कहो,
“चाक सीनों के सिलने लगे”, तुम कहो,
इस खुले झूठ को,
ज़हन की लूट को,
मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता।
[रिंदा == drinker]
[चाक == torn slits]
[ज़हन == difficult to translate, means roughly soul or heart]

तुमने लूटा है, सदियों हमरा सूकूं
अब न हम पर चलेगा, तुम्हारा फ़ुसूं
चारागर दर्दमंदो के बनते हो क्यों?
तुम नहीं चारागर,
कोई माने मगर,
मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता।
[फ़ुसूं == deception/magic]
[चारागर == healer]

On Cultural Revivals … and Gandhi!

Had a discussion about Gandhi’s “Hind Swaraj“, and difference between western and Indian thought, and how good some old things were, and do we need a revival. And this came to mind:

उस सूखे ठूँठ पर नई टहनी पर नए पत्ते आए हैं।
यह उस पुराने, विशालकाय, छायावान पेड़ की याद नहीं दिलाते,
जो बुढे ज्ञानी बाबा के समान था, और अब ठूँठ बना खड़ा है।
यह टहनी तो आंगन में खेलती, छोटी, प्यारी बच्ची की याद दिलाती है।
पत्तों का आकार भले ही वैसा हो,
पर इस टहनी को फिर विशालकाय छायावान वृक्ष बनने मे समय लगेगा।
कितना ही गुस्सा, आंदोलन, तमाशा कर लो,
पर पेड दिनों मे बड़े नहीं होते।
ना ही ठूँठ अपनी पुरानी रौनक को लौटते हैं।
छाया फिर चाहिए,
तो वह छोटा-सा ठूँठ का तुकड़ा ढूंढो,
जहाँ अभी नमी बाकी है।
उसे सींचो,
और प्रार्थना करो कि वहाँ एक नई टहनी फूटे,
जो सालों बाद हि सही, पर छाया ज़रूर दे।
तब तक बुज़ुर्गों के सुनाए बूढ़े, विशालकाय, छायावान बरगद के किस्सों से ही काम चलाओ।
और तब तक,
कोई भी मिनटों मे ठंडे छायादार आराम का लोभ दे,
तो उस पर विश्वास न करो।

Haseen Shaam Na De

Wrote another gazal in quick succession… seems like I’m getting back to form 🙂

तबाही की ख़बर अब सर-ए-आम न दे,
रोज़-ए-नाकाम को हसीं शाम न दे।

मैं जानता हूँ वजह तेरी बेरुख़ी की,
अपने फ़ैसलों को मजबूरी का नाम न दे।

दहशत के लम्हों बाद, निकला है सड़कों पे,
अपनी गरज़ को हौसले का ईनाम न दे।

सफ़र-ए-मुहब्बत मे बहुत मक़ाम बाकी हैं,
अपने कदमों को बेवजह आराम न दे।

नूर-ए-इलाही की अदनी किरन काफ़ी है,
अब ज़िन्दग़ी को तबाही का अंजाम न दे।

इस बरस बसंत मे अमराई ना खिली,
बुलबुल-ए-बन को तू ये पैग़ाम न दे।

मय-ए-ख़ुदगर्ज़ी मे जो धुत है हर पल,
या रब, किसी वतन को ये अवाम न दे।

Aao ki khwaab bunein…

Found a gem by Sahir Ludhianvi:

आओ कि ख़्वाब बुनें, कल के वास्ते
वरना ये रात, आज के संगीन दौर की
ड़स लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीन ख़्वाब बुन सके

[ संगीन दौर == difficult time ]
[ ता-उम्र == till the end of life ]

गो हमसे भागती रही ये तेज़-ग़ाम उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र

[ तेज़-ग़ाम == fast ]

ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होटों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब,
मैराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुखन के ख़्वाब,
तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोघ-ए-वतन के ख़्वाब,
ज़िन्दा के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब

[ मैराज-ए-फ़न == proficiency in an art form ]
[ कमाल-ए-सुखन == excellence in expression/poetry ]
[ तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी == good and civilized life ]
[ फ़रोघ-ए-वतन == nation’s progress ]
[ ज़िन्दा == prison cell ]
[ कूचा-ए-दार-ओ-रसन == the path leading to gallows]

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल की असास थे
ये ख़्वाब मर गए हैं तो बेरंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-संग है हयात

[ असास == basis ]
[ दस्त-ए-तह-ए-संग == hand pressed under the force of a rock ]

आओ कि ख़्वाब बुनें, कल के वास्ते
वरना ये रात, आज के संगीन दौर की
ड़स लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीन ख़्वाब बुन सके

Iqbal Again – Lab Pe Aati Hai Dua

After the previous post, I did substantial research on Iqbal. And read a few of his works available on the net. I am surely going to buy a book now. But here’s one more great nazm by him:

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शम्मा की सुरत हो खुदाया मेरी

हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब
इल्म की शम्मा से हो मुझको मुहब्बत या रब

हो मेरा काम गरीबों की हिमायत करना
दर्दमदों से ज़इफों से मुहब्बत करना

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझको

[ ज़ीनत == beauty/decoration ] [ इल्म == knowledge/education ] [ ज़इफों == old and weak ]

Iqbal

I never really got into reading much of Allama Iqbal. I knew that he’s the one who gave us the legendary “Saare jahaan se accha” and “ab tak magar hai baki naam-o-nishaan hamara“. My blog will tell you that I love Faiz, and almost any musical thing remotely Pakistani 🙂 … but Iqbal somehow never appealed to me. Untill the day before yesterday, when I heard “Kabhi ai haqeeqat-e-muntazar…”. By far the best modern “Sufi” composition, that I’ve read. The God is referred and not referred. It is a prayer and not a prayer. It is about love, and not about love. It is well, out-standing.

As Faiz would have said – “Jo Gayab Bhi Hai, Hazir Bhi. Jo Manzar Bhi Hai, Nazir Bhi”.

Here it goes:

कभी ऐ हक़िक़त-ए-मुन्तज़र, नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं, मेरी जबीन-ए-नयाज़ में

[ हक़िक़त-ए-मुन्तज़र is long-awaited reality ] [ लिबास == attire ] [ मजाज़ == material ] [ सजदे == prostrations of prayer ] [ जबीन == forehead ] [ नयाज़ == expectant / needy ]

तू बचा बचा के न रख इसे, तेरा आईना है वो आईना
कि शिक़स्ता हो तो अज़ीज़तर है निगाह-ए-आईनासाज़ में

[ शिक़स्ता == broken ] [ अज़ीज़तर == preferred ] [ निगाह-ए-आईनासाज़ == eyes of the mirror-maker ]

ना कहीं जहाँ में अमाँ मिली, जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली
मेरे ज़ुर्म-ए-ख़ानाख़राब को, तेरे अज़ो-ए-बंदा-नवाज़ में

[ अमाँ == refuge ] [ ज़ुर्म-ए-ख़ानाख़राब == wretched sins ] [ अज़ो-ए-बंदा-नवाज़ == (gracious) forgiveness ]

ना वो इश्क़ मे रही गर्मियाँ, ना वो हुस्न मे रही शोख़ियाँ
ना वो गज़नवी मे तड़प रही, ना वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में

[ गज़नवी == Mahmud Ghaznavi, a dominant ambitious ruler ] [ ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ == hair-locks of Ayaz, Ayaz means slave – but her it refers to Malik Ayaz ]

जो मैं सर-बा-सजदा हुआ कभी, तो ज़मीन से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम आशना, तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में

[ सर-बा-सजदा == head held is prostration ] [ सदा == voice / call / echo ] [ आशना == lover ]

… and I have four different renditions, in four different compositions to share. Here they are:

Ibrar Ul Haq

Nusrat Fateh Ali Khan

Ghulam Ali

Rahat Fateh Ali Khan

Sham-e-Gam

Talat Mehmood is one my favorite singers of all time, and Sham-e-gam ki kasam is by far is most soulful song of his. Majrooh Sultanpuri wrote the song for the 1953 film “Footpath” … and the poetry is equally matched by Khayyam’s music. Here are the lyrics:

शाम-ए-गम की कसम, आज गमगीं हैं हम,
आ भी जा आभी जा आज मेरे सनम।
शाम-ए-गम की कसम…

दिल परेशान है, रात वीरान है,
देख जा किस तरह आज तनहा हैं हम।
शाम-ए-गम की कसम…

चैन कैसा जो पहलू मे तू ही नही,
मार डाले ना दर्द-ए-जुदाई कहीं।
ऋत हसीं है तो क्या, चांदनी है तो क्या,
चांदनी ज़ुल्म है और जुदाई सितम।
शाम-ए-गम की कसम…

अब तो आजा कि अब रात भी सो गई,
ज़िन्दग़ी गम के सहरा मे खो गई,
धुंढ़ती है नज़र, तू कहाँ है मगर,
देखते देखते आया आँखों मे दम।
शाम-ए-गम की कसम…

And you can listen to the song here: http://www.saavn.com/p/song/hindi/foot+path/shaam-e-gham+ki/SARfcwdkUmY

Ahir ki chhohariya

Time to say happy birthday to Krishna! So, here’s my favorite piece of poetry (by Raskhan) about him:

सेस, महेस, गनेस, दिनेस, सुरेसहुँ जाँही निरंतर गावें,
जाँही अनादी, अनन्त, अखण्ड, अछेद, अभेद, सुवेद बतावें,
नारद से शुक व्यास रटें, पचि हारे तऊ पुनि पार न पावें,
ताही अहीर की छोहरिया, छछिया भर छाँछ पे नाच नचावें।

… whom all the mighty beings: the Shesha (the celestial remainder mighty snake), Mahesh (the almighty Shiva), Ganesha, Dinesha (the sun god), and Suresha (the king of god’s Indra) eternally praise,
… who has always been described as the one without begining or end, who is complete in itself, is impenetrable, itself is the undifferentiated reality, and obviously is the omniscient,
… from Narada to Shuka Muni to Vyaas are tired of chanting whose name, and still could not understand him completely,
… he himself dances to the tune of a bunch of cowherd girls, just for a pot of buttermilk.

Besides, I love the god who sets nice precedents like stealing clothes of girls bathing in a river. 😉

Harih Om!

Dhandhe ki baat

Indian society, of today, is slowly restoring the respect and money deserved by those who serve arts. Arts of any kind, those involving colours, vocal chords, words, body gestures, thoughts and what not. But no society can do without those artists who feel rejected by society … from Kalidas to Ghalib, from Majaaz to Nagarjun … some time in their lives did feel rejected. I somehow relate to them, somehow find myself thinking their thoughts. Though, my profession has not much to do with arts (yet); and as an entrepreneur, I feel the world has been quite nice to me. But still, it seems their is a poet within, who yearns for rejection, so that it can aggravate the fire in its belly.

Rejection, it seems, is the spark needed to ignite that fire in the belly. Sarasvati’s eluding of Brahma’s sexual advances is what creates the fire in Brahma that made him create. Sarasvati is the primordial goddess… it manifests as the world when Brahma manifests as me, it manifests as the muse when Brahma manifests as the poet, it manifests as the wealth when Brahma manifests as the entrepreneur. And she always rejects him first … that creates the fire … the fire that creates … the primordial fire Agni that threatened to swallow Brahma himself (according to Rig Veda).

Okay too much serious talk, here’s one humorous expressoin of that poet’s fire, when recognition eludes him. It’s a song from V Shantaram‘s legendary film Navrang:
http://www.saavn.com/p/song/hindi/navrang/kavi+raja+kavita+ke/KUUpAS5vdkk

http://www.raaga.com/play/?id=107119

कवि राजा कविता के ना अब कान मरोड़ो
धंधे की कुछ बात करो, कुछ पैसे जोड़ो।

शेर-शायरी कवि राजा ना काम आएगी,
कविता की पोथी को दीमक खा जाएगी।
भाव चढ़ रहे, अनाज हो रहा महंगा दिन-दिन,
भूख मरोगे, रात कटेगी तारे गिन-गिन।
इसीलिए कहता हूँ भैय्या यह सब छोडो,
धंधे की कुछ बात करो, कुछ पैसे जोड़ो।

अरे! छोड़ो कलम, चलाओ मत कविता की चाकी।
घर की रोकड देखो, कितने पैसे बाकी।
अरे! कितना घर में घी है, कितना गरम मसाला,
कितने पापड, बडी, मंगोडी, मिर्च-मसाला,
कितना तेल, नोन िमर्ची, हल्दी और धनिया।
कवि राजा चुपके से तुम बन जाओ बनिया।

अरे! पैसे पर रच काव्य, भूख पर गीत बनाओ।
अरे! गेहूं पर हो गज़ल, धान के शेर सुनाओ।
नोन मिर्च पर चौपाई, चावल पर दोहे।
सुकवि कोयले पर कविता लिखो तो सोहे।
कम भाडे की खोली पर लिखो कव्वाली,
झन-झन करती कहो रुबाई पैसे वाली।

शब्दों का जंजाल बडा लफ़डा होता है।
कवि-सम्मेलन दोस्त बडा झगडा होता है।
मुशायरे के शेरों पर रगडा होता है।
पैसे वाला शेर बडा तगडा होता है।
इसीलिए कहता हूँ न इससे सिर फोडो,
धंधे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोड़ो।