Category Archives for Self-composed

[sigh]” “[/sigh]

On Cultural Revivals … and Gandhi!

Had a discussion about Gandhi’s “Hind Swaraj“, and difference between western and Indian thought, and how good some old things were, and do we need a revival. And this came to mind:

उस सूखे ठूँठ पर नई टहनी पर नए पत्ते आए हैं।
यह उस पुराने, विशालकाय, छायावान पेड़ की याद नहीं दिलाते,
जो बुढे ज्ञानी बाबा के समान था, और अब ठूँठ बना खड़ा है।
यह टहनी तो आंगन में खेलती, छोटी, प्यारी बच्ची की याद दिलाती है।
पत्तों का आकार भले ही वैसा हो,
पर इस टहनी को फिर विशालकाय छायावान वृक्ष बनने मे समय लगेगा।
कितना ही गुस्सा, आंदोलन, तमाशा कर लो,
पर पेड दिनों मे बड़े नहीं होते।
ना ही ठूँठ अपनी पुरानी रौनक को लौटते हैं।
छाया फिर चाहिए,
तो वह छोटा-सा ठूँठ का तुकड़ा ढूंढो,
जहाँ अभी नमी बाकी है।
उसे सींचो,
और प्रार्थना करो कि वहाँ एक नई टहनी फूटे,
जो सालों बाद हि सही, पर छाया ज़रूर दे।
तब तक बुज़ुर्गों के सुनाए बूढ़े, विशालकाय, छायावान बरगद के किस्सों से ही काम चलाओ।
और तब तक,
कोई भी मिनटों मे ठंडे छायादार आराम का लोभ दे,
तो उस पर विश्वास न करो।

03. April 2012 by Nikhilesh Ghushe
Categories: Darshan, Gandhi, Self-composed, Sukhan | 1 comment

Haseen Shaam Na De

Wrote another gazal in quick succession… seems like I’m getting back to form :)

तबाही की ख़बर अब सर-ए-आम न दे,
रोज़-ए-नाकाम को हसीं शाम न दे।

मैं जानता हूँ वजह तेरी बेरुख़ी की,
अपने फ़ैसलों को मजबूरी का नाम न दे।

दहशत के लम्हों बाद, निकला है सड़कों पे,
अपनी गरज़ को हौसले का ईनाम न दे।

सफ़र-ए-मुहब्बत मे बहुत मक़ाम बाकी हैं,
अपने कदमों को बेवजह आराम न दे।

नूर-ए-इलाही की अदनी किरन काफ़ी है,
अब ज़िन्दग़ी को तबाही का अंजाम न दे।

इस बरस बसंत मे अमराई ना खिली,
बुलबुल-ए-बन को तू ये पैग़ाम न दे।

मय-ए-ख़ुदगर्ज़ी मे जो धुत है हर पल,
या रब, किसी वतन को ये अवाम न दे।

12. September 2011 by Nikhilesh Ghushe
Categories: Self-composed, Sukhan | 2 comments

Zamaane se bachaai hai

Wrote a gazal after a long while. Hope you like it:

मेरी करवटों में बसी जो तबाही है,
वही तेरी आँखों में आज छाई है।

जो नागँवाराँ है अहल-ए-हुक्म को आज,
वही धुन हमने कई बार गाई है।

इक उम्र से ये आस थी आसमाँ से,
आखिर इस शहर मे भी बाढ़ आई है।

हमने माना की फूलों की सेज नहीं है,
पर ये राह बड़ी फ़ुरसत से बनाई है।

इक ज़माने मे जिसको राख़ कहते थे,
आज वही मेरे कलम की स्याही है।

इस गज़ल मे जो ख़नक है सच की,
बड़ी मेहनत से ज़माने से बचाई है।

31. August 2011 by Nikhilesh Ghushe
Categories: Darshan, Self-composed, Sukhan | Leave a comment

Kavi

New poem, just written. And quite satisfying like the last one :)

गुरु बोले – “जा खोज के आ
कि फूल है क्या?”
इक फूल दिखा,
मै मुस्काया।
उसके सौरभ को,
प्राणों मे भर लाया।
मन सुख मे नत हो आया,
तब मैनें जाना – फूल है क्या।

जब लौटा, तो गुरु ने पूछा -
“बता शिष्य कि फूल है क्या?”

मन ने सुन्दर आकार लिया,
पर शब्द रुके मुख तक आकर।
क्या पीत-श्वेत-लोहित मरमर,
यह कह देंगे जो मुझे दिखा?
कैसे समझाऊँ सौरभ को
जिसने प्राणों मे रस घोला?

शब्द खेलते आँख मिचौली,
बुद्धी धूंडती शब्दों को।
कभी तीव्रता से जा पकडे,
पर पाए फ़िका उनको।
कभी ऊंघते शब्द स्वयं ही,
आ जाते सम्मुख मेरे।
पर उत्तर फिर भी दे न सका
आखें औ’ सिर नत मेरे।

गुरु मुस्काए।
मुझको देखा।
कुछ कहा नहीं,
और चले गए।

मैने माना कि विफल बुद्धी।
शब्दों के होते मुक्त प्राण।
बंधन मे उनको बांधोगे,
तो भागेंगे वे बचा प्राण।
मान बुद्धी को विफल अगर,
उस फूल मे मन को रम लोगे,
तो शब्द तितलियों से आकर,
खुद ही मन पर मंडराएँगे।
बिन लगाम के बुद्धी की,
तब गीत कण्ठ गाए मेरा।
जो जिह्वा से उस पल निकला,
वह सहज बनी मेरी कविता।

मैं बहुत खुशी से लहराया -
“कह दिया है मैने फूल है क्या।”
पर दो पल रुक कर सोचो तो,
क्या मैं हूँ कवि इस कविता का?

09. July 2009 by Nikhilesh Ghushe
Categories: Darshan, Self-composed, Sukhan | 7 comments

Arpan

I wrote poetry after a long time. And this time, unlike all other times, I am feeling very satisfied with it. I called it अर्पण, a dedication. Here’s the poem:
घन उपवन मे थे फूल चार।
कुछ संजो लिए, कुछ बिखर गए।
जो संजो लिए, वह तुझे चढे।
जो बिखर गए, वह तुझे मिले।

नक्षत्र प्रचुर विस्तृत नभ मे,
कुछ दिखे और कुछ छुपे रहे।
वे छुपे तुम्हारी झोली मे,
औ’ दिखे तुम्हारी रौनक से।

बहती नदिया मे जल अपार,
कुछ बहा दिया, कुछ भर लाया।
जो भरा, तुझ ही पर चढा दिया,
जो बहा दिया वह तुझे मिला।

वन पथ पर कटंक बहुत मिले,
कुछ चुभे और कुछ पडे रहे।
जो रक्त बहा वह तेरा था,
जो दर्द हुआ वह तुझे हुआ।

जीवन पथ पर सौ लोग मिले,
कुछ साथ रहे, कुछ चले गए।
तुझको देखा हर साथी मे,
और उनमे भी, जो चले गए।

जो तूने खुद को तृप्त किया,
आभार किसी का क्या मानूँ?
जो दर्द खुद ही तू भोग रहा,
क्या खेद करूँ, और क्या रोउँ?

22. April 2009 by Nikhilesh Ghushe
Categories: Featured, Self-composed, Sukhan | 12 comments

Basant

Nowdays, I keep playing with Garage Band. And though I was always interested in Indian classical music, I never did anything musical myself. So I decided to understand a few raagas.This site:
http://www.swarganga.org/raagabase.php

was really helpful. So I took up a raag – Basant – and tried playing it. Then I added some percussion in the background, and got this

http://www.ghushe.com/m/my/Basant.m4a

Enjoy!! :D

08. February 2009 by Nikhilesh Ghushe
Categories: Music, Self-composed | 6 comments

Ranbheri (the battle cry)

Poems are like beds. They come in all forms – from extremely pink, furry, mushy and soft to back-painingly rock hard. You can always add cushions to make them better. They can be used as decorative pieces in drawing rooms, without much utility though. And they seem unnecessarily clumsy when used as decorations. They have their own roles to play in love affairs (okay don’t look at me like that… they have nice and legitimate roles to play… you pervert). They can be hollow when they come, and the ‘user’ can put substance into them by his imagination. If you don’t want others to see a broken piece, you always have sheets to cover them.

And of course, you can sleep over them.

So here’s a poem which I wrote the day before, clad it in a big white sheet yesterday, and I slept over it the yesterday night. Take it:

पथिक! क्यों रणभेरी बजाता है?

बिखरे हुए इस राज्य को,
क्या जीत कर मिलना तुझे।
हारी हुई सेनाओं से,
क्या सोच भिड़ना है तुझे।

हराकर इन मृतों को,
क्या जीत तेरी हो सकेगी?
या तुझे भी जान निर्दय,
वह भी रुख कुछ मोड़ लेगी।

जबकि इन सब बैरियों को,
वह चुका है मार,
औ’ तुझे बतला रहा
बस निमित्त लाचार।

फिर भी पग क्यों लड़खड़ाते,
हाथ से गिरता धनुष क्यों?
ईश्वरेच्छा से बंधा,
हर एक युग मे यह मनुज क्यों?

कर बंधे हैं, चरण हारे,
दोष फिर भी स्वयं मे ही पाता है,
पथिक! क्यों रणभेरी बजाता है?

कर रहे इंकार शर अब,
चाप से ही छुटने को,
जबकी भौंरा भी विकल सब,
सौरभों को लूटने को।

क्या यह पहली बार है,
कि हो रहा है मन विकल?
कर रहा इंकार है अब,
प्रेरणा को भी निगल।

क्या देखा है तुमने पहले,
निमित्त को किसी,
किसी युग मे,
स्वयं को निमित्त मानने से करते इंकार।
या देखा है उसे,
गहरी सोच मे ड़ुबे
पहचानते टटोलते अपने ही ध्येय का आकार।

या फिर उलट कर,
जवाब देते, कर्ता को
अपने ही ।

क्या यह केवल,
इसी युग की सच्चाई है?
या फिर होता रहा है युगों से यही निरंतर।
या शायद,
प्रत्येक युद्ध के पहले,
मिट जाता है कर्ता और निमित्त का अंतर।

सारथी और धनुर्धर मानों,
जान पडते हों,
एक ही।

तीक्ष्ण दृष्टी है, सोच प्रबल,
फिर भी स्वयं मे कर्ता नहीं देख पाता है,
पथिक! क्यों रणभेरी बजाता है?

जब कर्ता की आवाज़,
हो जाती है पुरानी,
तो निमित्त खुद मे ही
खोज लेता है कर्ता की बानी।

गु्नगुनाते हैं सैकडो
अंतर मे छुपे साज़,
जब सुन पाता है वह
अपनी ही नई आवाज़।

पर वही आवाज़ें पुरानी और विकट,
प्रतिध्वनित हो लौट आती है,
और कानों के आकर निकट,
खोए विश्वास को समेट रणभेरी बजातीं हैं।

सच्चा युद्ध नहीं जीता
बाणों की पैनाहट से जाता,
धनुर्धर भी कभी क्या,
जीत का श्रेय ले पाता?

कुरुक्षेत्र तो केवल, गुँजती
टकराती आवाज़ों से बनता है।
और विजय ध्वज उठाने वाला,
निश्चय ही नया कर्ता बनता है।

और फिर,
वही निमित्त,
जिसने कभी स्वयं मे,
नया कर्ता खोज लिया था,
फिर से,
मूक धनुर्धर बन,
नई आवाज़ मे,
पुरानी प्रेरणा पाता है।
पथिक! क्यों रणभेरी बजाता है?
पथिक! क्यों रणभेरी बजाता है?

01. August 2006 by Nikhilesh Ghushe
Categories: Darshan, Self-composed, Sukhan | 5 comments

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