Zarquon is not very punctual

Even prophets don’t have a sense of proportion

Aabhaar


First time posting something by Shiv Mangal Singh Suman, the poet who stood out from all other’s in the pragatisheel school of poetry. So here goes aabhaar:

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला उस-उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग ड़ग, लम्बी मंजिल, तय कर लेना कुछ खेल नही।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद।
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसो पर अवलम्बित काया, जब चलते चलत चूर हुई,
दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद,
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर?
मैं भी न चलूँ यदि तो क्या राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद,
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर?
कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर।
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद।
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला उस-उस राही को धन्यवाद।

Filed under: Gazal and Poetry, Sukhan — nikhilesh.ghushe at 3:24 pm on Wednesday, November 30, 2005

Intesaab


Filed under: Gazal and Poetry, Sukhan — nikhilesh.ghushe at 2:53 pm on Saturday, November 26, 2005

Grief


Filed under: General — nikhilesh.ghushe at 6:35 pm on Thursday, November 24, 2005

Sufi


Filed under: Memories, Music, Gazal and Poetry — nikhilesh.ghushe at 7:57 pm on Wednesday, November 9, 2005