Mein Ab
Still another self-composed gazal. I wrote this yesterday night. An unusual ‘radiif’ and an unusual mood, started to wander into philosophy but somehow got pulled back to love. That Happens, Also in real life.
So here it is:
क्यों भीगती न रुह मेरी है बारिशों में अब
मिट चुके से रंग सब है ख़्वाहिशों में अब
जो गुज़र गया वो मोड कुछ इस कदर मुडा
दिल लगे ना ज़िन्दगी की साज़िशों में अब
वो वक़्त था कि बुत ड़हे मेरे कलाम से
न शोर है न ज़ोर कुछ गुज़ारिशों में अब
इस कदर सुकून में मेरा वजूद है
हो पाख़ियों की फ़ौज जैसे गर्दिशों में अब
भा गया है इस कदर कोइ हसीँ मुझे
कि लुत्फ़ है अजीब सा ये बंदिशों में अब
हर एक बात उस हसीँ कि छेड़ती है यूँ
पुरज़ोर मन लगा है रोज़ रंजिशों में अब