Zarquon is not very punctual

Even prophets don’t have a sense of proportion

Arpan


I wrote poetry after a long time. And this time, unlike all other times, I am feeling very satisfied with it. I called it अर्पण, a dedication. Here’s the poem:
घन उपवन मे थे फूल चार।
कुछ संजो लिए, कुछ बिखर गए।
जो संजो लिए, वह तुझे चढे।
जो बिखर गए, वह तुझे मिले।

नक्षत्र प्रचुर विस्तृत नभ मे,
कुछ दिखे और कुछ छुपे रहे।
वे छुपे तुम्हारी झोली मे,
औ’ दिखे तुम्हारी रौनक से।

बहती नदिया मे जल अपार,
कुछ बहा दिया, कुछ भर लाया।
जो भरा, तुझ ही पर चढा दिया,
जो बहा दिया वह तुझे मिला।

वन पथ पर कटंक बहुत मिले,
कुछ चुभे और कुछ पडे रहे।
जो रक्त बहा वह तेरा था,
जो दर्द हुआ वह तुझे हुआ।

जीवन पथ पर सौ लोग मिले,
कुछ साथ रहे, कुछ चले गए।
तुझको देखा हर साथी मे,
और उनमे भी, जो चले गए।

जो तूने खुद को तृप्त किया,
आभार किसी का क्या मानूँ?
जो दर्द खुद ही तू भोग रहा,
क्या खेद करूँ, और क्या रोउँ?

Filed under: Sukhan, Self-composed — nikhilesh.ghushe at 7:05 pm on Wednesday, April 22, 2009