Haseen Shaam Na De

Wrote another gazal in quick succession… seems like I’m getting back to form 🙂

तबाही की ख़बर अब सर-ए-आम न दे,
रोज़-ए-नाकाम को हसीं शाम न दे।

मैं जानता हूँ वजह तेरी बेरुख़ी की,
अपने फ़ैसलों को मजबूरी का नाम न दे।

दहशत के लम्हों बाद, निकला है सड़कों पे,
अपनी गरज़ को हौसले का ईनाम न दे।

सफ़र-ए-मुहब्बत मे बहुत मक़ाम बाकी हैं,
अपने कदमों को बेवजह आराम न दे।

नूर-ए-इलाही की अदनी किरन काफ़ी है,
अब ज़िन्दग़ी को तबाही का अंजाम न दे।

इस बरस बसंत मे अमराई ना खिली,
बुलबुल-ए-बन को तू ये पैग़ाम न दे।

मय-ए-ख़ुदगर्ज़ी मे जो धुत है हर पल,
या रब, किसी वतन को ये अवाम न दे।