Haseen Shaam Na De

Wrote another gazal in quick succession… seems like I’m getting back to form 🙂

तबाही की ख़बर अब सर-ए-आम न दे,
रोज़-ए-नाकाम को हसीं शाम न दे।

मैं जानता हूँ वजह तेरी बेरुख़ी की,
अपने फ़ैसलों को मजबूरी का नाम न दे।

दहशत के लम्हों बाद, निकला है सड़कों पे,
अपनी गरज़ को हौसले का ईनाम न दे।

सफ़र-ए-मुहब्बत मे बहुत मक़ाम बाकी हैं,
अपने कदमों को बेवजह आराम न दे।

नूर-ए-इलाही की अदनी किरन काफ़ी है,
अब ज़िन्दग़ी को तबाही का अंजाम न दे।

इस बरस बसंत मे अमराई ना खिली,
बुलबुल-ए-बन को तू ये पैग़ाम न दे।

मय-ए-ख़ुदगर्ज़ी मे जो धुत है हर पल,
या रब, किसी वतन को ये अवाम न दे।

2 thoughts on “Haseen Shaam Na De

  1. बहुत उम्दा पंक्तियाँ लिखीं हैं आपने घुशे साहेब !

    इस कलम को रुकने का नाम ना दे
    और रुके तो दिल-ए-दिमाग़ को इल्ज़ाम ना दे
    यूँ तो शब और रोज गुजर जाएँगे दिन-ब-दिन
    अपने ख्वाबो और शब्दो को लगाम ना दे ||

    लिखते चलो मेरे दोस्त …

  2. Atri, Jaideep says:

    Meri nahi hai, kahi suni thi

    Koi aankhon aankhon se baat kar leta hai
    Koi aankhon aankhon mein mulakaat kar leta hai
    Bada Mushkil hota hai tab Jawab denA
    Jab koi KhamosH rehkar Sawaal kar leta hai.

    yeh kuch bas abhi abhi taza Nazm aapke liye likhi hai, Arz kiya hai..

    dosti zindagi ki shuruwat hai,
    yeh na khaatam hone wali haseen raat hai…
    zindagi umang bina laash hai,
    magar is sher ko ache se kehna hai,
    tu sahi shayer ki talash hai……. jiyo miya Ghuse

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