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I never really got into reading much of Allama Iqbal. I knew that he’s the one who gave us the legendary “Saare jahaan se accha” and “ab tak magar hai baki naam-o-nishaan hamara“. My blog will tell you that I love Faiz, and almost any musical thing remotely Pakistani 🙂 … but Iqbal somehow never appealed to me. Untill the day before yesterday, when I heard “Kabhi ai haqeeqat-e-muntazar…”. By far the best modern “Sufi” composition, that I’ve read. The God is referred and not referred. It is a prayer and not a prayer. It is about love, and not about love. It is well, out-standing.

As Faiz would have said – “Jo Gayab Bhi Hai, Hazir Bhi. Jo Manzar Bhi Hai, Nazir Bhi”.

Here it goes:

कभी ऐ हक़िक़त-ए-मुन्तज़र, नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं, मेरी जबीन-ए-नयाज़ में

[ हक़िक़त-ए-मुन्तज़र is long-awaited reality ] [ लिबास == attire ] [ मजाज़ == material ] [ सजदे == prostrations of prayer ] [ जबीन == forehead ] [ नयाज़ == expectant / needy ]

तू बचा बचा के न रख इसे, तेरा आईना है वो आईना
कि शिक़स्ता हो तो अज़ीज़तर है निगाह-ए-आईनासाज़ में

[ शिक़स्ता == broken ] [ अज़ीज़तर == preferred ] [ निगाह-ए-आईनासाज़ == eyes of the mirror-maker ]

ना कहीं जहाँ में अमाँ मिली, जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली
मेरे ज़ुर्म-ए-ख़ानाख़राब को, तेरे अज़ो-ए-बंदा-नवाज़ में

[ अमाँ == refuge ] [ ज़ुर्म-ए-ख़ानाख़राब == wretched sins ] [ अज़ो-ए-बंदा-नवाज़ == (gracious) forgiveness ]

ना वो इश्क़ मे रही गर्मियाँ, ना वो हुस्न मे रही शोख़ियाँ
ना वो गज़नवी मे तड़प रही, ना वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में

[ गज़नवी == Mahmud Ghaznavi, a dominant ambitious ruler ] [ ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ == hair-locks of Ayaz, Ayaz means slave – but her it refers to Malik Ayaz ]

जो मैं सर-बा-सजदा हुआ कभी, तो ज़मीन से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम आशना, तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में

[ सर-बा-सजदा == head held is prostration ] [ सदा == voice / call / echo ] [ आशना == lover ]

… and I have four different renditions, in four different compositions to share. Here they are:

Ibrar Ul Haq

Nusrat Fateh Ali Khan

Ghulam Ali

Rahat Fateh Ali Khan

Ham Ke Thehare Ajnabi …

Faiz Ahmed Faiz, is better known for his revolutionary fervor and socialist ideal. He can almost be considered the strongest amongst the socialistic revolutionary voices of Pakistan. This was not unusual for poets of his time. We had the likes of Nagarjun in India.

What is quite surprising about Faiz, or may be not, is that he has a wonderful, soft and romantic side too. We know that Faiz fell in love with and married a British woman named Alys. She is considered by many to have molded the personality and expression of Faiz. Talking about this soft side of Faiz, two gazals come to my mind, “Tum mere paas raho” (which I’ll surely post some day), and the one posted below. Its hard to say much about Faiz’s emotional state or situation in life at the time of writing, but he by far captured the awkwordness of certain situations as beautifully as anyone could. Enjoy!!

हम के ठहरे अजनबी कितनी मदारातों के बाद
अब बनेंगे आशना कितनी मुलाक़ातों के बाद

[मदारात == hospitality, expression of affection]
[आशना == lovers]

कब नज़र मे आएगी बेदाग सब्ज़े की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

[बेदाग == clear, unadulterated]
[सब्ज़े की बहार == green and fresh season of spring]

दिल तो चाहा पर शिक़स्त-ए-दिल ने मोहलत हि न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बाद

[शिक़स्त-ए-दिल == heart’s defeat (heart getting out of control because of extreme affection)]
[गिले शिकवे == cribs, complaints]
[मुनाजातों == affectionate prayers]

फ़िर बहुत बेदर्द लम्हे खत्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बेमेहर सुबहें मेहरबाँ रातों के बाद

[खत्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ == end of love’s pain]
[बेमेहर == ufriendly, unforgiving, not helpful, opposite of मेहरबाँ]

उनसे जो कहने गए थे फ़ैज़ जान सदक़ा किये
अनकही ही रह गई वह बात सब बातों के बाद

[जान सदक़ा किये == with letting life for sacrifice]
[अनकही == unsaid]

Two very different renditions of the gazal are available:

  • By Nayyara Noor, which you can listen to here. Video of one of the live shows is here.
  • By Shubha Mudgal, which you can find here. I couldn’t get you guys a free link. But this version is good too.

Aaj Bazaar Mein

I have posted ‘intesab’ by Faiz Ahmed Faiz earlier. This is another one of his very popular poems. It was written during the rule of General Zia in Pakistan, and has a very distinct revolutionary fervor. It urges everyone who feels dejected of the happenings around him, to come out and get heard, inspite of the odds. And the feel is surprisingly similar to the spirit of Gandhi’s satyagrah, rather than that of call for a violent revolution.

आज बाज़ार में पा-ब-जौंला चलो।
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहीं,
तोहमत-ए-इश्क़ पोशीदा काफ़ी नहीं,
आज बाज़ार में पा-ब-जौंला चलो।
[जौंला == बेड़ी, shackles; पा-ब-जौंला == shackled feet]
[चश्म-ए-नम == eyes with tears] [जान-ए-शोरीदा == distressed soul]
[तोहमत-ए-इश्क़ == blame of love] [पोशीदा == hidden]

दस्त-ए-अफ़्शाँ चलो मस्त-ओ-रक्साँ चलो
ख़ाक-बर-सर चलो खूँ-ब-दामाँ चलो
राह तकता है शहर-ए-जानाँ चल।
आज बाज़ार में पा-ब-जौंला चलो।
[दस्त-ए-अफ़्शाँ == with swingin arms] [मस्त-ओ-रक्साँ == dancing merrily]
[ख़ाक-बर-सर == head to feet covered in mud] [खूँ-ब-दामाँ == with blood stained sleeves]
[शहर-ए-जानाँ == the beloved city]

हाकिम-ए-शहर भी, मजमा-ऐ-आम भी,
तीर-ए-इल्ज़ाम भी, संग-ए-दुशनाम भी,
सुबह-ए-नाशाद भी, रोज़-ए-नाकाम भी,
पा-ब-जौंला चलो
आज बाज़ार में।
आज बाज़ार में पा-ब-जौंला चलो।
[हाकिम-ए-शहर == rulers of the city (shall watch)]
[मजमा-ऐ-आम == flocks common men (shall watch)]
[तीर-ए-इल्ज़ाम == (so that you get) arrows of accusations]
[संग-ए-दुशनाम == (so that you get) stones of insults]
[सुबह-ए-नाशाद == (do so despite) depressing mornings]
[रोज़-ए-नाकाम == (do so despite) unsuccessful days]

इनका दमसाज़ अपने सिवा कौन है?
शहर-ए-जानाँ में अब बासिफ़ा कौन है?
दस्त-ए-कातिल के शायाँ रहा कौन है?
रक्स-ए-दिल बांध लो दिल फिगारो चल॥
फिर हमीं कत्ल हों आएँ यारा चलो।
आज बाज़ार में पा-ब-जौंला चलो।
[दमसाज़ == friend] [सिफ़ा == good reference, so बासिफ़ा == trustworthy]
[दस्त-ए-कातिल == murderer’s hands] [शायाँ == safe]
[रक्स-ए-दिल == heartbeat] [दिल फिगारो == with a broken heart]

For the whole last week, I have been haunted by Nayyara Noor‘s rendition of this song. You can listen to it here.



















So i’m back after long. And this time with Urdu again. Faiz ahmed faiz’s Intesaab. No words required to describe it. And the words remind me of India and Delhi and i’m sure would remind any Pakistani of Lahore. The words make a lot of things boundaryless. So here is something from across the border:

आज के नाम
आज के ग़म के नाम
आज का ग़म कि है ज़िन्दगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ा
ज़र्द पत्तों का बन
ज़र्द पत्तों का बन जो मेरा देस है
दर्द का अंजुमन जो मेरा देस है
किलर्कों की अफ़सुर्दा जानों के नाम
किर्मख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम
पोस्ट-मैनों के नाम
तांगेवालों के नाम
रेलबानों के नाम
कारख़ानों के भोले जियालों के नाम
बादशाह-ए-जहाँ, वालि-ए-मासिवा, नएबुल्लाह-ए-फ़िल-अर्ज़, दहकाँ के नाम

जिस के ढोरों को ज़ालिम हँका ले गये
जिस की बेटी को डाकू उठा ले गये
हाथ भर ख़ेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली है
दूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली है
जिस के पग ज़ोर वालों के पाँवों तले
धज्जियाँ हो गयि है

उन दुख़ी माओं के नाम
रात में जिन के बच्चे बिलख़ते हैं और
नींद की मार खाये हुए बाज़ूओं से सँभलते नहीं
दुख बताते नहीं
मिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं

उन हसीनाओं के नाम
जिनकी आँखों के गुल
चिलमनों और दरिचों की बेलों पे बेकार खिल खिल के
मुर्झा गये हैं
उन ब्याहताओं के नाम
जिनके बदन
बेमोहब्बत रियाकार सेजों पे सज सज के उकता गये हैं
बेवाओं के नाम
कतड़ियों और गलियों, मुहल्लों के नाम
जिनकी नापाक ख़ाशाक से चाँद रातों
को आ आ के करता है अक्सर वज़ू
जिनकी सायों में करती है आहो-बुका
आँचलों की हिना
चूड़ियों की खनक
काकुलों की महक
आरज़ूमंद सीनों की अपने पसीने में जलने की बू

पड़नेवालों के नाम
वो जो असहाब-ए- तब्लो-अलम
के दरों पर किताब और क़लम
का तकाज़ा लिये, हाथ फैलाये
पहुँचे, मगर लौट कर घर न आये
वो मासूम जो भोलेपन में
वहाँ अपने नंहे चिराग़ों में लौ की लगन
ले के पहुँचे जहाँ
बँट रहे थे घटाटोप, बे-अंत रातों के साये
उन असीरों के नाम
जिन के सीनों में फ़र्दा के शबताब गौहर
जेलख़ानों की शोरीदा रातों की सर-सर में
जल-जल के अंजुम-नुमाँ हो गये हैं

आनेवाले दिनों के सफ़ीरों के नाम
वो जो ख़ुश्बू-ए-गुल की तरह
अपने पैग़ाम पर ख़ुद फ़िदा हो गये हैं