Zarquon is not very punctual

Even prophets don’t have a sense of proportion

Dekhakar


Its time for another self-composed one. The first two and the last sher were written years ago. I added the middle ones recently, while I was on a bus trip to Pune and was getting bored. So here’s the gazal:

कहता हूँ गज़ल मेहफ़िल वीरान देखकर,
कहूँ तो क्या कहूँ ये कदरदान देखकर।

उस राह पर हज़ारों कदम पड़ रहे हैं आज,
छोड़ी थी हमने जो कभी, आसान देखकर।

मचल रही ये बिजलियाँ, ये अब्र, ये ज़मीन,
तुझे देख ड़गमगा मेरा ईमान देखकर।

बहर बढ़ा नदी की ओर, साहिलों को तोड़,
मेरे वजूद को माशूख़ पे कुर्बान देखकर।

कुछ कह रही तेरी नज़र नशे में गर्द सी,
कुछ कहने से रुकी मेरी ज़ुबान देखकर।

इन आँखो पे कहे शेर भी भुला रहा हूँ मैं,
इन आँखो में तेरी हुस्न का ग़ुमान देखकर।

ख़्वाहिश न रही दिल में कोई जी रहा हूँ बस,
हसरत भरे हुज़ूर के अरमान देखकर।

Filed under: Gazal and Poetry, Sukhan, Self-composed — nikhilesh.ghushe at 5:49 pm on Thursday, January 26, 2006

Seekho na


This one is my all time favorite. And everything about it is fascinating…. composition, voice and especially lyrics. So here they are:

सीखो ना….
सीखो ना नैनों की भाषा पिया
कह रही है….
तुमसे ये खामोशियाँ
सीखो ना ….
लब तो न खोलुंगी मैं
समझो दिल की बोली
सीखो ना….
सीखो ना नैनों की भाषा पिया

सुनना सीखो
उन हवा को
सन-न-सन सन-न-सन कहती है क्या
पढ़ना सीखो
सलवटों को
माथे पे ये बलखाके लिखती है क्या
आहटों की हैं अपनी ज़ुबाँ
इनमे भी है इक दास्ताँ
जाओ जाओ जाओ जाओ पिया …

सीखो ना….
सीखो ना नैनों की भाषा पिया
कह रही है….
तुमसे ये खामोशियाँ
सीखो ना ….
लब तो न खोलुंगी मैं
समझो दिल की बोली
सीखो ना….
सीखो ना नैनों की भाषा पिया

गहरे पानी
जैसा लम्हा
छेदो ना इसे हिल जायेंगी गहराइयाँ
हलकी साँसो
के शेहर में
देखो तो ज़रा बोलती है क्या परछाइयाँ
कहने को अब बाकि है क्या
आखों ने सब कह तो दिया
जाओ जाओ जाओ जाओ पीया …

सीखो ना….
सीखो ना नैनों की भाषा पिया
कह रही है….
तुमसे ये खामोशियाँ
सीखो ना ….
लब तो न खोलुंगी मैं
समझो दिल की बोली
सीखो ना….
सीखो ना नैनों की भाषा पिय

BTW, a lot of friends around me somehow rate the song equally high. I’m surprised. But ya, most of them are in love or perhaps pretend to their girl-friends that they are in love. Does that conclude anything? :)

Filed under: Music, Sukhan — nikhilesh.ghushe at 4:35 pm on Tuesday, January 24, 2006

Na karo …


I feel like posting another self-composed one. A gazals this time:

अपने दीदार को मेरी आदत न करो
यूँ दीवानों-सी मेरी हालत न करो।

न जाओ सहर से पहले उठकर तुम
या मिलने की इनायत न करो।

मेरे दिल को संभलने की राह बतलाओ
या आँखों से यूँ शरारत न करो।

न पिलाओ आँखों से जाम भर-भर कर
या बहकने की शिकायत न करो।

मेरी मौत को मुकर्रर समझो
या मुझसे यूँ मोहब्बत न करो।

Filed under: Gazal and Poetry, Sukhan, Self-composed — nikhilesh.ghushe at 5:38 pm on Wednesday, January 18, 2006