Sukhan

Urdu for Expression

Ranbheri (the battle cry)


Poems are like beds. They come in all forms - from extremely pink, furry, mushy and soft to back-painingly rock hard. You can always add cushions to make them better. They can be used as decorative pieces in drawing rooms, without much utility though. And they seem unnecessarily clumsy when used as decorations. They have their own roles to play in love affairs (okay don’t look at me like that… they have nice and legitimate roles to play… you pervert). They can be hollow when they come, and the ‘user’ can put substance into them by his imagination. If you don’t want others to see a broken piece, you always have sheets to cover them.

And of course, you can sleep over them.

So here’s a poem which I wrote the day before, clad it in a big white sheet yesterday, and I slept over it the yesterday night. Take it:

पथिक! क्यों रणभेरी बजाता है?

बिखरे हुए इस राज्य को,
क्या जीत कर मिलना तुझे।
हारी हुई सेनाओं से,
क्या सोच भिड़ना है तुझे।

हराकर इन मृतों को,
क्या जीत तेरी हो सकेगी?
या तुझे भी जान निर्दय,
वह भी रुख कुछ मोड़ लेगी।

जबकि इन सब बैरियों को,
वह चुका है मार,
औ’ तुझे बतला रहा
बस निमित्त लाचार।

फिर भी पग क्यों लड़खड़ाते,
हाथ से गिरता धनुष क्यों?
ईश्वरेच्छा से बंधा,
हर एक युग मे यह मनुज क्यों?

कर बंधे हैं, चरण हारे,
दोष फिर भी स्वयं मे ही पाता है,
पथिक! क्यों रणभेरी बजाता है?

कर रहे इंकार शर अब,
चाप से ही छुटने को,
जबकी भौंरा भी विकल सब,
सौरभों को लूटने को।

क्या यह पहली बार है,
कि हो रहा है मन विकल?
कर रहा इंकार है अब,
प्रेरणा को भी निगल।

क्या देखा है तुमने पहले,
निमित्त को किसी,
किसी युग मे,
स्वयं को निमित्त मानने से करते इंकार।
या देखा है उसे,
गहरी सोच मे ड़ुबे
पहचानते टटोलते अपने ही ध्येय का आकार।

या फिर उलट कर,
जवाब देते, कर्ता को
अपने ही ।

क्या यह केवल,
इसी युग की सच्चाई है?
या फिर होता रहा है युगों से यही निरंतर।
या शायद,
प्रत्येक युद्ध के पहले,
मिट जाता है कर्ता और निमित्त का अंतर।

सारथी और धनुर्धर मानों,
जान पडते हों,
एक ही।

तीक्ष्ण दृष्टी है, सोच प्रबल,
फिर भी स्वयं मे कर्ता नहीं देख पाता है,
पथिक! क्यों रणभेरी बजाता है?

जब कर्ता की आवाज़,
हो जाती है पुरानी,
तो निमित्त खुद मे ही
खोज लेता है कर्ता की बानी।

गु्नगुनाते हैं सैकडो
अंतर मे छुपे साज़,
जब सुन पाता है वह
अपनी ही नई आवाज़।

पर वही आवाज़ें पुरानी और विकट,
प्रतिध्वनित हो लौट आती है,
और कानों के आकर निकट,
खोए विश्वास को समेट रणभेरी बजातीं हैं।

सच्चा युद्ध नहीं जीता
बाणों की पैनाहट से जाता,
धनुर्धर भी कभी क्या,
जीत का श्रेय ले पाता?

कुरुक्षेत्र तो केवल, गुँजती
टकराती आवाज़ों से बनता है।
और विजय ध्वज उठाने वाला,
निश्चय ही नया कर्ता बनता है।

और फिर,
वही निमित्त,
जिसने कभी स्वयं मे,
नया कर्ता खोज लिया था,
फिर से,
मूक धनुर्धर बन,
नई आवाज़ मे,
पुरानी प्रेरणा पाता है।
पथिक! क्यों रणभेरी बजाता है?
पथिक! क्यों रणभेरी बजाता है?

Filed under: Gazal and Poetry, Jeevan Darshan, Sukhan, Self-composed — nikhilesh.ghushe at 3:52 pm on Tuesday, August 1, 2006

Midsummer Nights Dream


Yes. Its still summer in Delhi. And its night right now. And I just woke up in the middle of it, mostly because of a dream, and partly because I reminded myself that Germany has lost the semis to Italy.

Anyways, the night gave me an opportunity to finish an unfinished gazal of mine, so here it is:

शायर भी हुआ है कोई ये राह छोड़कर
इन मय से भरी आँख़ों की पनाह छोड़कर

बरसी न घटा इस कदर है सदियों में कभी
जिस माह तू मिली वो इक माह छोड़कर

सह लेगा दिल मेरा कई जामों का बिछड़ना
न कट पाए ज़िन्दगी तेरी निगाह छोड़कर

जब से सुनी वो नज़्म हुआ दिल पे वो असर
दिल कर रहा है आह, खुद ही आह छोड़कर

बुला रही है रौशनी सहर के उस तरफ़
जाऊँ तो किस कदर ये रात स्याह छोड़कर

तू चाहता है छोड़ दूँ ये ज़िद मेरी अभी
हर चाह मान लूँ तेरी ये चाह छोड़कर

कर के वो गया बात बड़ी सूझ से भरी
गया वो आशियाँ मगर तबाह छोड़कर

Dont ask me contexts. Many things have contributed to the gazal, the night, the summer, the world cup, and the mail from a friend that I just read. :)

Filed under: Gazal and Poetry, Sukhan, Self-composed — nikhilesh.ghushe at 4:44 am on Wednesday, July 5, 2006

The unsaid…


Another self-composed one, after a while. Actually wrote this one sometime back. But somehow found today an appropriate time to post. Also, have been a bit busy lately.

So here’s the gazal:

तुम नही तो और कोई चल रहा है संग,
कश्ती के लिए कब रुकी नदी की है तरंग।

न पूछो उसका नाम जो हुई फ़िज़ा मे गुम
मान लो कि दिल मे छुपी थी कोई उमंग।

कि भूल जाऊँ या संजोऊँ ख़्वाब वह हँसीन
बढ़ूँ तो किस तरफ़ कहो कि रास्ते हैं तंग।

ज़िन्दगी के ये सवाल देखकर के अब
दिल-ओ-दिमाग़ मे छिडी है जैसे कोई जंग।

रंग खिल उठे जो सुने हमने वो जवाब
खुशी के हैं कि गम के पता किसके है वो रंग।

वो कहते हैं न उनके लिए ग़म करे कोई
गम बिना भी है कोई क्या ज़िन्दगी का ढ़ंग।

Filed under: Gazal and Poetry, Sukhan, Self-composed — nikhilesh.ghushe at 5:04 am on Tuesday, April 11, 2006

Hamdard


This time a self-composed mukta-chhanda. No particular reason or thought line behind it, really free flowing words:

क्यों लौट कर आया है वो हमदर्द
वो पिघलता दर्द
वो आधे लिखे ख़त
वो पहचानी-सी आहट
वो कागज़ पर उतरने से इनकार करते लव्ज़
वो अपने हि मतलब के ज़ाहिर होने से ड़रते लव्ज़
वो अनछुई लकीरों को लाँघने की चाह
वो तिनके से छोटी पर फ़िर भी आसमानों को छुती आह
वो दूर परदेस से आती आवाज़ों को सुनने की ललक
वो हवाओं को महकाती रातरानी के फूलों की महक
वो कुछ कह जाने के ड़र से चुप चाप महफ़िल से दूर अंधेरे कोने ढूंढ़ता मैं
वो भेद ना खुल जाये इस ड़र से हलकी-सी झुकती आँखों को पूरी तरह मूंदता मैं
वो सिलसिलेवार हाथों से बिछड़ता दिल, और फ़िर सिलसिलेवार दिल को छुते हाथ
वो किसी के साथ न होते हुए भी महसूस होता किसी का साथ
वो रोशनी से मुलक़ात
आज बरसों के बाद
क्यों लौट कर आयी है और कर गयी है इस वक़्त को चटकीले रंगों मे गर्द
क्यों लौट कर आया है वो हमदर्द

Filed under: Gazal and Poetry, Sukhan, Self-composed — nikhilesh.ghushe at 4:33 am on Sunday, February 12, 2006

Mein Ab


Still another self-composed gazal. I wrote this yesterday night. An unusual ‘radiif’ and an unusual mood, started to wander into philosophy but somehow got pulled back to love. That Happens, Also in real life.

So here it is:

क्यों भीगती न रुह मेरी है बारिशों में अब
मिट चुके से रंग सब है ख़्वाहिशों में अब

जो गुज़र गया वो मोड कुछ इस कदर मुडा
दिल लगे ना ज़िन्दगी की साज़िशों में अब

वो वक़्त था कि बुत ड़हे मेरे कलाम से
न शोर है न ज़ोर कुछ गुज़ारिशों में अब

इस कदर सुकून में मेरा वजूद है
हो पाख़ियों की फ़ौज जैसे गर्दिशों में अब

भा गया है इस कदर कोइ हसीँ मुझे
कि लुत्फ़ है अजीब सा ये बंदिशों में अब

हर एक बात उस हसीँ कि छेड़ती है यूँ
पुरज़ोर मन लगा है रोज़ रंजिशों में अब

Filed under: Gazal and Poetry, Sukhan, Self-composed — nikhilesh.ghushe at 8:56 am on Saturday, February 4, 2006

Dekhakar


Its time for another self-composed one. The first two and the last sher were written years ago. I added the middle ones recently, while I was on a bus trip to Pune and was getting bored. So here’s the gazal:

कहता हूँ गज़ल मेहफ़िल वीरान देखकर,
कहूँ तो क्या कहूँ ये कदरदान देखकर।

उस राह पर हज़ारों कदम पड़ रहे हैं आज,
छोड़ी थी हमने जो कभी, आसान देखकर।

मचल रही ये बिजलियाँ, ये अब्र, ये ज़मीन,
तुझे देख ड़गमगा मेरा ईमान देखकर।

बहर बढ़ा नदी की ओर, साहिलों को तोड़,
मेरे वजूद को माशूख़ पे कुर्बान देखकर।

कुछ कह रही तेरी नज़र नशे में गर्द सी,
कुछ कहने से रुकी मेरी ज़ुबान देखकर।

इन आँखो पे कहे शेर भी भुला रहा हूँ मैं,
इन आँखो में तेरी हुस्न का ग़ुमान देखकर।

ख़्वाहिश न रही दिल में कोई जी रहा हूँ बस,
हसरत भरे हुज़ूर के अरमान देखकर।

Filed under: Gazal and Poetry, Sukhan, Self-composed — nikhilesh.ghushe at 5:49 pm on Thursday, January 26, 2006

Na karo …


I feel like posting another self-composed one. A gazals this time:

अपने दीदार को मेरी आदत न करो
यूँ दीवानों-सी मेरी हालत न करो।

न जाओ सहर से पहले उठकर तुम
या मिलने की इनायत न करो।

मेरे दिल को संभलने की राह बतलाओ
या आँखों से यूँ शरारत न करो।

न पिलाओ आँखों से जाम भर-भर कर
या बहकने की शिकायत न करो।

मेरी मौत को मुकर्रर समझो
या मुझसे यूँ मोहब्बत न करो।

Filed under: Gazal and Poetry, Sukhan, Self-composed — nikhilesh.ghushe at 5:38 pm on Wednesday, January 18, 2006

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